The Missing Bunker  { A short story }

​दिसम्बर 22 , 1943 


जापान में परमाणु हमले से करीब दो साल पहले , जर्मनी के दक्षिण शहर म्युनिक में ।


कुछ अमेरिकी टुकड़ीया म्युनिक शहर को अपने कब्जे में ले चुकी थी।


पर वो दिन , अमेरिका की एक टुकड़ी , जो अपने दो गुमशुदा सैनिको की खोज में हमेशा की तरह निकली थी , के लिए सबसे मशक्कत , और बेबसी भरा दिन था ।


दिन में करीब , 1 बजे , पेट्रोलिंग के दौरान , उन्हें अपने मोटे आर्मी बूट्स की टप टप के अलावा एक अलग आवाज सुनाई दी , ठीक अपने पैरो के आस पास , जो काफी तेज नहीं थी , ऐसा लग रहा था जैसे , हल्की और दबी आवाज में कोई गाने सुन रहा हो ।


म्युनिक शहर के , उस चीखते सन्नाटे में , ये हल्का सा शोर , उस पूरी पेट्रोलिंग टीम का ध्यान अपनी तरफ खेंचने के लिए काफी था ।


और पेट्रोलिंग कमांडर डेनियल रुट को ये समझने में जरा सी भी देर नहीं लगी , की उनके पैरों के ठीक नीचे बने एक बंकर में , कुछ जर्मन सैनिक , स्कॉटलैंड व्हिस्की , के साथ  ,ओपेरा सुनकर दावत उड़ा रहे है ।


शायद उन जर्मन सैनिको को पता ही ना हो की उनका ये म्युनिक शहर अमेरिकीयो के कब्जे में है , वरना अपने दुश्मन को इस तरह से संगीत की आवाज से कौन न्योता देगा , डेनियल रुट शायद उस जमीन की तरफ देख कर यही सोच रहे थे ।


ज़मी पर जमी कुछ मिलीमीटर बर्फ को जब , कमांडर के कहने पर सैनिको ने हटाया ,तो आँखे निकल कर बाहर आ गयी ।

एल्युमीनियम से बना एक मोटा दरवाजा , जो सरक सकता था , अंदर और बाहर जाने के लिए , कुछ सफ़ेद कागजो से ढका हुआ था ।


उस एल्युमीनियम के दरवाजों को सरकाते वक़्त तो ख़ुशी बहुत हुई होगी कमांडर को , आखिर जर्मन सैनिको को पकड़ने के इतने करीब जो थे ।


पर जब वो एल्युमीनियम से बना दरवाजा सरक कर एक तरफ आया , अंदर करीब बीस सीढ़ियों के बाद एक बेहद मजबूत लोहे और कुछ धातुओं से बना अजीब सा मोटा एक और दरवाजा था , जो शायद बंकर के अंदर की तरफ से ही खुलता था ।


कमांडर को ज़रा भी फर्क नहीं पड़ा , उसने मुस्कुरा कर अपनी टुकड़ी से तीन सैनिको को अपने पास बुलाया और इशारो में कुछ कहा , तभी उन तीन सैनिको के अलावा सभी दस कदम पीछे जाकर खड़े हो गए ।


उन तीन सैनिको ने एक एक करके तीन विस्फोटक प्लेट्स , जो जमीनी सुरंगों में इस्तेमाल होने वाला खतरनाक विस्फोटक है , बीस सीढिया उत्तर कर , उस मोटे से दरवाजे के पास लगाकर बाहर निकल आये , जिनमे से एक सैनिक के पास तीन पतली और लंबी रस्सियां थी ।


और वे तीन सैनिक भी दस कदम पीछे चल अपने साथियो के साथ खड़े हो गए और वे रस्सियां जो उस सुरंग से निकल कर आ रही थी , कमांडर को पकड़ा दी ।


कुछ सेकण्ड्स बाद कमांडर ने कुछ बड़बड़ा कर वे तीनों रस्सियां एक साथ खेंच दी , और जो विस्फोट हुआ , वो इतना खतरनाक था , की टुकड़ी के पैरों के नीचे की ज़मीन थर्रा गयी , और पास ही खड़ी एक बहुमंज़िला ईमारत के कांच किसी पतझड़ की तरह ज़मीन पर आ गिरे ।

सीढियो की ओर से उठते उस धुंए की तरफ सैनिक अपनी राइफल और कमांडर अपनी पिस्टल लिए इस तरह खड़े थे जैसे वे जर्मन सैनिक बाहर आने को है ।


कुछ देर बाद जब धुंआ छंटा , तो सभी धीरे धीरे उस बंकर की तरफ़ बढे , और जब अंदर देखा , रति भर भी वो दरवाजा , इधर से उधर नहीं हुआ ।


ये देख कमांडर चिल्लाया , और तभी अंदर से आती उस ओपेरा की आवाज और तेज़ हो गयी ।


अब ये तो तय था , बंकर के अंदर बैठे उन जर्मन सैनिको को ये तो पता था , की अमेरिकी सैनिक उन्हें घेर के खड़े है , और शायद वे ये भी जानते थे , की उनका म्युनिक शहर अमेरिकीयो के कब्जे में है , शायद तभी वे उस ओपेरा को तेज बजा कर उन अमेरिकी सैनिको के शक्ति प्रदर्शन का मजाक उड़ा रहे थे ।


कमांडर डेनियल रुट का सारा फितूर उत्तर गया , उनके बेड़े का सबसे खतरनाक विस्फोटक वो आजमा चुके थे वो भी एक नहीं , तीन एक साथ ।


झल्ला कर कमांडर उन सीढियो में सबसे आखिरी सीढी तक गया और उस मोटे से दरवाजे के आगे जाकर चिल्लाया , तीन दिन बाद क्रिसमस पर वो फिर विस्फोट करेगा , उस दिन  तुम्हे जीसस भी नहीं बचा पाएंगे ।


तीन दिन बाद जब वैसा ही विस्फोट वापस किया गया , दरवाजा वही फौलाद की तरह खड़ा रहा , आखिर हार कर , उसने सुरंग खोदने वाली भारी भरकम अमेरिकी ड्रिलिंग मशीन मंगवा ली जो उत्तरी जर्मनी में थी , जिसे सड़क द्वारा म्युनिक तक पहुचने में बीस दिन लगने थे ।


बीसवें दिन तक , जब तक वो ड्रिलिंग मशीन नहीं आ गयी , वे जर्मन सैनिक वही ओपेरा सुनते और अमेरिकीयो को चिढ़ाते ।

उस दिन जब ड्रिलिंग मशीन ने उस बंकर में एक बड़ा छेद किया , कमांडर ने आर्डर दिया बंकर में छेद से कुछ हथगोले फेंके जाए ताकि उन जर्मन सैनिको की ज़िंदा बचने और वापसी गोलाबारी की उम्मीद ख़त्म हो जाये ।


और जब कमांडर और कुछ सैनिक अंदर घुसे तो देखा , एक ट्रांजिस्टर , एक बैटरी से प्लग इन है , और उन हथगोलों के विस्फोट के बाद भी बज रहा है , कमांडर की नज़र दूसरे कोने में पड़ी तो , उसके होश उड़ गए , दो अमेरिकी सैनिक एक ही रस्सी से बंधे थे , मृत और नग्न ।


और उनके किनारे से निकलती एक सुरंग , जो उन जर्मन सैनिको ने अपने निकलने के लिए खोदी थी , में कमांडर ने अपने एक सैनिक को घुसाया , देखने के लिए की आखिर ये सुरंग निकलती कहा है , तो जब वो अमेरिकी सैनिक सुरंग के दूसरे छोर पर निकला तो ये वही जगह थी जहाँ , विस्फोठ के वक्त दस कदम दूर अमेरिकी सैनिक खड़े होते थे ।


क्रिसमस के दिन जब उस कमांडर ने विस्फ़ोट किया तब उसने शायद अपने सैनिक ठीक से , नहीं , गिने ही नहीं , वे 49 नहीं , 51 थे ।


हां ! उन दो जर्मन सैनिको के साथ , जिन्होंने उन दो गुमशुदा अमेरिकी सैनिको की यूनिफार्म पहन रखी थी ।


बंकर में जर्मन झंडे के साथ एक कागज पर डच भाषा में लिखा था….


” ik had constipatie van sommige laatste days..thanks commandant, uw Blast geeft mij dus reliëf … tot slot ik heb een aantal kak … bedankt voor niet het tellen van “


English translation-


” I had constipation from some last days..thanks commander , your blast gives me so relief…finally I did some poop…thanks for not counting “



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Written by

Kuldeep choudhary

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The MILLIONAIRE {हिंदी} #2

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September 27, 11:10 pm

Monitoring And Decoding Room

R&AW Headquarter ; Delhi , India.

कंप्यूटर और फोन ट्रैकिंग , टैपिंग की अत्याधुनिक मशीनों से भरा व्यवस्थित कमरा और सबसे कोने में रखे एक कंप्यूटर के सामने बैठ कर कुछ काम कर रहा जॉय अचानक कमरे से भाग कर , बाहर निकल , पास ही बने joint secretary के ऑफिस में घुस गया ।


जॉय- सर सॉरी ! पर आपको ये देखना चाहिए । its urgent .

सुधीर शुरी ( Joint secretary)- क्या वाकई ???

सुधीर शुरी उतावलेपन से उठके जॉय के पीछे हो लिए , और जॉय वापस अपने उसी कंप्यूटर के सामने बैठकर बोला..”सर आपने लाहौर के एक सॅटॅलाइट फोन को surveillance पर रखने को कहा था ; कुछ एक महीने पहले ।

सुधीर शुरी- हाँ ! कोई मूवमेंट है क्या ?

जॉय- सर ! सॅटॅलाइट फोन का कोई नंबर तो होता नहीं है ,तो कॉलर पता लगाना मुश्किल होता है , पर कॉलर की लोकेशन ट्रेस करना उतना ही आसान होता है । कुछ देर पहले ही इस सॅटॅलाइट फोन पर पहली बार कॉल आया करीब 9:15 बजे । सर लोकेशन मुघलपुरा , लाहौर है ।

सुधीर शुरी- कॉल किसने किया ! बात क्या हुई ? कुछ बता सकते हो !

जॉय- सर जैसा की मेने कहा कॉलर के बारे में नहीं , पर उसकी लोकेशन आसानी से ट्रेस की जा सकती है । और वही देखकर मैं आपके पास भाग कर आया ।

सर dialer call ; PSLV 15 से जुड़ा हुआ था ।


सुधीर शुरी- क्या कह रहे हो ? PSLV-15 ? ISRO का सॅटॅलाइट ? कॉल इंडिया से किया गया उस लाहौर के सॅटॅलाइट फोन पर ???

जॉय- हां सर ! कॉल इंडिया में कही से सॅटॅलाइट to सॅटॅलाइट किया गया है , मतलब इसरो के सॅटॅलाइट से पाकिस्तान के किसी टेलीकॉम सॅटॅलाइट पर । और सर रियल टाइम लोकेशन तो पता या तो इसरो को हैक करके , या इसरो से official passcodes मांग के लगायी जा सकती है ।

और सर मैं हैक कर सकता हूं ।

सुधीर शुरी- नहीं ! मैं passcodes लेने की formalities पूरी करता हूं , कोशिश करेंगे की कल तक लोकेशन हमारे पास हो । पर ये बात तुम अपने तक ही रखोगे , कलिख को भी नहीं । you understand that ???

जॉय- ओके सर ! सर बात सिर्फ दो मिनट हुई उस फोन पर , अगली बार हम बात भी सुन पाएंगे ।

सुधीर शुरी well done कहते हुए उस कमरे से बहार निकल गए ।


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September 28 , 10:00 am

Quaid-e-azam college of commerce for girls , Lahore , pakistan

कॉलेज के बड़े से दरवाजे के सामने सड़क पर खड़ा एक गाड़ियों का काफिला , जिनमे सबसे आगे और पीछे पाकिस्तानी रेंजर्स की दो काली जिप्सी थी , उद्योगपतियों को IS से मिल रही धमकियों के बाद पाकिस्तानी आर्मी को इन उद्योगपतियों की सुरक्षा में लगाया गया था और बीच में , 3 आलिशान Volvo xc 90 खड़ी थी ।

दूर से देख कर ही वो कॉलेज के दरवाजे के परे बैठा गार्ड सलाम किये हुए खड़ा था ।

उन तीनों में से सबसे आगे की volvo xc 90 में बैठा मिलियनेयर गाडी के काले शीशो से साफ़ नज़र आ रहे कॉलेज के दरवाजे को घूरे जा रहा था और तभी उस दरवाजे से

एक 23 साल की लड़की , आँखों में हल्का काजल ,कानो में लंबे चांदी के झुमके , गुलाबी होठो पर मुस्कुराती मुस्कान , हरे और सफ़ेद रंग के सलवार कमीज , हाथो में एक बड़ा सा कंगन , ऊँगली में एक बड़ी सी अंगूठी , और मखमल से पैरो में चमड़े की बनी जुतिया , जैसे बसंत के मौसम ने इंसानी रूप ले लिया हो ,

बाहर निकली ।

और गार्ड की उंगलियो के इशारे को देख गाड़ियों की ओर दौड़ी चली आयी ।

तीन खड़ी उन आलिशान गाड़ियों में से उसने तीसरी का दरवाजा खोला , काले शीशो की वजह से वो हर बार समझ नहीं पाती थी , अंदर से आवाज आई..”साहब आगे से दूसरी नंबर की गाडी में है “


और वो भाग कर , volvo का दरवाजा खोल अंदर बेठ गयी , और आव देखा ना ताव बोलना शुरू कर दिया..

“मुझे बात ही नहीं करनी तुमसे , कल नहीं आये , परसो भी नहीं मिले , तुम्हारे काम काम होते है , तो हम भी फ़िज़ूल नहीं है यहाँ”…बोलकर एक झलक उसने मिलियनेयर की आँखों में देखा , armaani के किसी एक महंगे चश्मे ने उसकी आँखों को छुपा रखा था ।

“हटाओ इसे”…कहकर उसने वो काला चश्मा मिलियनेयर की आँखों से हटा दिया ।

“अब देखो मेरी तरफ और बताओ क्यों नहीं आये मुझसे मिलने”

वो हल्का सा मुस्कुरा कर सुनता रहा , और गाड़ियों के काफिले से वो volvo अलग होकर एक किसी दूसरे रास्ते पर चलने लगी और कुछ दूर जाकर ठहर गयी ।

गाडी रुकते ही वो झट से गेट खोल कर बाहर कार के दूसरी तरफ जा खड़ी हुई , जहा से मिलियनेयर उतर रहा था ।

मिलियनेयर जोर से हँसता हुआ बोला ” कितना बोलती हो ना , वाक़ई वक़्त की कमी थी , इसीलिए मिल नहीं पाए , वरना तुम जानती हो , जी कहा लगता है मेरा तुम्हारे बिना”।


किसी पठार पर खड़े थे दोनों , तेज हवा , सरसो के फूलों की गंध से पता पड रहा था कि आस पास कही खेत है , पानी का हल्का शोर बता रहा था कही झरने भी थे आसपास ।


“जानती हूं , पर ये हर बार मुझे इतना दूर इसी जगह क्यो लाते हो मिलने और ये बन्दूक मत रखा करो , रेंजर्स है ना साथ , तुम्हे नहीं रखनी है ये”…तेज हवा से उड़ते कोट की वजह से देख पायी वो रिवाल्वर को ।

“जिनके ख्वाब महंगे होते है ना नसीबा , उन्हें उजालो से डर लगता है “…मिलियनेयर पास ही लगे पेड़ की लहराती पतियो को देख कर बोला ।


कितनी शायरी मारते हो ना , आज मुझे देख कर कोई जुमला याद नहीं आया ” हँसते हुए नसीबा बोली ।


“एक तुझे देख लेने के बाद किसी का दिल तोड़ने का जी नहीं करता ;

इस ईद पर मिलिएगा , तुम्हे देख कर रोज़ा तोड़ेंगे हम” ….


नसीबा की आँखों में देख कर मिलियनेयर ने बड़े गज़ब तरीके से कहा , और मुड़कर गाडी की तरफ जाने लगा ।

“जानते है वक़्त कम है तुम्हारे पास , पर वाह वाह तो सुन लो हमारी”…कहते हुए नसीबा गाडी तक आयी ।

“ये लो ! संभाल कर ; कुछ देर में बहादुर अली तुम्हे कॉलेज छोड़ देगा”…एक सफ़ेद रंग का लिफाफा नसीबा को पकड़ा कर मिलियनेयर volvo में बैठ गया ।

“ऐ सुनो , ये हर बार एक लिफाफा देकर जाते हो , और खोलने को मना कर रखा है , वो भी मोहब्बत की कसम देकर , कब खोले हम इसे ये तो बता दो”…नसीबा ने गाडी के शीशे को अंगूठी से बजाकर कहा ।

“एक दिन कसम खुद-ब-खुद टूट जायेगी , उस दिन खोल लीजियेगा इसे और एक बात बताऊ तुम्हे , याद रखना पेरिस में एफिल टावर के नीचे लोग अपने खोये हुए प्यार को ढूंढने के लिए इकट्ठा होते है” ।…कहकर मिलियनेयर ने ड्राइवर को चलने के लिए कह दिया ।



To be continued……….#3

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Read 1st part here

The MILLIONAIRE #1


Written by

Kuldeep choudhary

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The MILLIONAIRE {हिंदी} #1


September 27, 09:10 pm

Mughalpura police station ; Lahore

Pakistan


“बता दे जो पूछ रहे है…वरना अंजाम से तो वाकिफ होगा तू”…थानेदार निज़ाम अली ने रसोइये के मुँह को अपने मोटे हाथो से दबा कर गुस्से में पूछा ।

“साहब ! उतना ही जानता हूं मैं भी , जितना आप और ये पूरा मुल्क जानता है उनके बारे में”…भींचे हुए मुँह से रसोइया अटकते हुए बोला ।

“तबियत ठीक करो इसकी , मैं आता हूं कुछ देर में”…निजाम अली ने पास ही खड़े एक दूसरे पुलिस वाले को अपने हाथ का डंडा देकर कहा और फोन कान के लगा कर धीमे से फुसफुसाया …

“काम हुआ या नहीं ???”


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 September 27 , 09:10 pm ( same time )

Mughalpura road , Lahore , pakistan

उसी समय , मुगलपुरा की नामचीन बस्ती में , जहा कई करोड़पति लोग रहते थे , के एक बड़े से आलिशान घर में !

(अँधेरा फैला हुआ )

बीच में बने एक बड़े से हॉल में एक के ऊपर एक पड़ी तीन लाशे , और दिवार के सहारे बैठी एक जवान औरत और एक बच्चा , उनके खौफ खाये हुये चेहरे बता रहे थे की उन तीन लोगो को लाश बनते उन्होंने अपनी आँखों से देखा था !

और

सामने सीढियो पर बैठा हुआ एक शख्स जिसका चेहरा साफ नज़र नहीं आ रहा था , खुला हुआ कोट , पेंट से आधा अधूरा बाहर निकला हुआ सफ़ेद , खून से रंगा हुआ कमीज , दाएं हाथ की आस्तीन से निकलकर , rolex की काले रंग की घडी से , हाथ में पकड़ी हुई इज़रायली रिवाल्वर के आगे लगे , लंबे आटोमेटिक silencer से टपकता खून देखकर अंदाजा लगाया जा सकता था की वो सीढियो पर बैठा अकेला शख्स उन तीनों पर भारी पड़ा ।

तभी अंदर बैडरूम से फोन बजने की आवाज आई , वो सीढियो से उठकर बैडरूम की तरफ चलने लगा , और चलते चलते अपने दाए हाथ से बाए हाथ में काले दस्ताने पहन कर उसने वो केसरिया रंग की स्क्रीन में बज रहा satellite फोन उठाया ।

बड़ी तेज और बुलंद , पर किसी अधेड़ उम्र के शख्स की आवाज फोन के उस तरफ से आयी…

“hello millionaire”!

 जवाब में उसने कुछ नहीं कहा ,उसके आँखों की पुतलियां , फोन पर उस अधेड़ उम्र की आदमी की बातों के साथ साथ घूम रही थी ।

चुपचाप उस फोन पर सुनते हुए एकदम उसका ध्यान , बाहर हॉल में बज रहे फोन से टुटा ।

बिजली की तेजी से उसने वो satellite फोन बिस्तर पर फेंककर , अपनी रिवॉल्वर को कसकर पकड़कर वो बिना डरे हॉल की तरफ बढ़ा ।

फोन बजने की आवाज उस लाशो के ढेर से आ रही थी ।

उन लाशो को पैरो से धकेल कर उसने ज़मीन पर पड़े उस मोबाइल को उठा कर उस औरत की तरफ कर दिया, जो शायद उन तीनों में से किसी की जेब से गिरा होगा ।


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“काम हुआ या नहीं ???”…निज़ाम की मोटी फुसफुसाती आवाज फोन उठाते ही उसे दूसरी तरफ से आयी ।

“Hello ! बोलो हरामखोरो ??? काम हुआ के नहीं ???”…झल्लाते हुए उसने फिर पूछा ।

“हेल्लो ,,,, हेल्लो ….निज़ाम अली फिर चिल्ला कर बोला ।


“हेल्लो ! सुनिये हम बोल रहे है आपकी बेगम , आप , आप छोड़ दीजिए उसे , आपने , आपने किसे पकड़ा है इनके रसोइये को , वरना ये मार देगा मुझे और आपके बच्चे को , वहशी है पूरा ये”…बात पूरी होने से पहले उस आदमी ने फोन अपने कान के पास लाकर कहा..”वही छोड़ के जा मेरे शेफ़ को , जहा से उठाया था , अगर बीवी के हाथ की बनी बिरयानी खाकर सोना चाहता है तो”…कहकर उसने वो फोन लाशो के ऊपर फेंक दिया !


थानेदार निजाम अली बौखलाया हुआ उस रसोइये के पास पंहुचा और खुद ही रसोइये की रस्सी खोलने लगा जो रसोइये के हाथों और पैरो से एक साथ बंधी थी ।

“अरे वही छोड़ आयो जहा से उठाया था इसे “…रुमाल से सिर का पसीना पोंछते हुए पास खड़े दो पुलिस वालों से निज़ाम अली बोला ।


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Will continues in next part…..

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Kuldeep choudhary

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Emergency {short Story}

Government medical college , aurangabad

Day#4 regional singing and dancing compitition.

Annual function {harmony}



तांडव करते महादेव ; रंगमंच के किनारे नंदी बना एक छात्र दंडवत प्रणाम किये पिछले 2 मिनट से यूही बैठा हुआ ; दर्शको का प्रोत्शाहित करने वाला शोर ; माहौल में हल्की हल्की महक गांजे की भी थी ; जिसे गंजेड़ी महादेवजी का प्रसाद मानते है ; यकायक शोर बढ़ने लगा ; लाल और नीले रंग की झपझपाती लाइट्स की झपझपाहट बढ़ने लगी ; मानो लग रहा हो सब कुछ आसमां की ऊंचाइयों में जाकर बसने जा रहा हो !

तभी महामार्त्युन्जे मंत्र का जाप करता वो स्पीकर बंद हो जाता है और पसीने से तरबतर आयुष माइक से announce करता है…”अगर किसी के पास (o-) ब्लड ग्रुप है तो प्लीज हॉस्पिटल की इमरजेंसी में आये ; ये urgent है ” !

तभी महादेव जी अपने हाथ से त्रिशूल फेंक कर मंच से दर्शक दीर्घा में कूद कर , ऑडिटोरियम के मुख्य दरवाजे से भागते हुए बहार निकलते है । कुछ सेकण्ड्स रुक पार्किंग की तरफ देख कर महादेवजी फिर इमरजेंसी की तरफ दौड़ने लगते है ।


सिर पर काली और सफ़ेद लंबी , घनी जटाये और उनमें से बाहर झांकता एक चाँद , गले तक लगा नीला लेप , कमर पर शेर की खाल सा चितकबरा कपडा लपेटा हुआ , नंगे पैर , गले में उलझा एक कपडे से बना सांप ।

महादेव ! ; हर कोई बस रुक कर उन्हें ही घूरता हुआ , सोच रहा था कि आखिर हो क्या रहा है ?


इमरजेंसी में पंहुंचते ही महादेव जी भीड़ को पीछे कर आगे पहुंचे तो दो डॉक्टर और कुछ नर्स से घिरे एक बेड पर लेटे उस आदमी को जब महादेव जी ने देखा तो आँखे दंग रह गयी ; महादेव जी के मुंह से धीमे से निकला …” मुस्ताक चाचा ”

तभी एक हाथ महादेव जी के कंधे पर पड़ा ।

“तो अभिषेक तुम्हारा (o-) है “…डॉ.नवीन ने पूछा ।

“जी सर “…अभिषेक ने अपने महादेव जी के कॉस्ट्यूम की तरफ देख कर कहा ।

“अरे कोई बात नहीं , जच रहे हो , रशीद भाई भगवान् खुद ब्लड देने आये है , अब कुछ नई होगा मुस्ताक जी को”…डॉ.नवीन ने पहले मुझसे फिर मुस्ताक चाचा के बेटे से कहा ।

10 मिनट बाद सारे टेस्ट हो जाने के बाद जब अभिषेक का खून लिया जा रहा था , वो बड़े शांत और गंभीर तरीके से बेहोश मुस्ताक चाचा के चोट के निशान घूर भी रहा था और साथ साथ कुछ सोच भी रहा था ।

20 मिनट बाद जब मुस्ताक का बेटा अभिषेक के लिए जूस लेकर आया , अभिषेक अपनी सोच से बाहर निकला ; और देखा की मुस्ताक भाई को होश आ गया , और उसी की आँखों को घूर मुस्कुरा रहे थे ; शायद वे भी पहचान गए थे इस गेट अप में अभिषेक को ।

अभिषेक भी मुस्कुरा दिया और जाने के लिए खड़ा हुआ तो मुस्ताक चाचा ने उंगलियो से पास आने का इशारा किया ।

अभिषेक जैसे इंतज़ार ही कर रहा था इस बुलावे का , मुस्ताक चाचा के सिरहाने बैठ मुस्ताक चाचा से पहले बोल उठा…”ये सब झूठ है कि ये सब महादेव जी का प्रसाद है ; ये सब चरस , गांजा , भांग ; ऐसा कुछ नहीं है और अंदर ही अंदर हम जानते भी है इस बात को ; ये सब बस हम खुद के पिने की इच्छा को और मजबूत करने के लिए कहते है ; आज के बाद आप ना ही ख़रीदेंगे और ना ही बेचेंगे , बेटे ठीक ठाक कमा लेते है क्या जरुरत है चाचा “…धीमे से कहते हुए अभिषेक ने चाचा के सफ़ेद बालो से भरे बूढ़े सिर पर हल्का और प्यारा हाथ फेरा ।

मुस्ताक चाचा भी मुस्कुरा दिए और हामी में सिर हिला दिया ; कैसे टाल सकते थे , आखिर नयी ज़िन्दगी दी थी महादेव जी ने ।

चाचा ने मुस्कुरा कर अपने कांपते हाथो की उंगलियां को पैरो में पड़े लंबे कोट की तरफ कर दिया ।

अभिषेक ने कोट की जेब खंगाल कर उसमें पड़ी एक पुड़िया अपनी कमर पर बंधे उस चितकबरे कपडे में गाँठ लगा कर बाँध दी और फिर मिलने का वादा कर मुस्ताक चाचा से इजाजत ली ।

“उस रात उस डांस कॉम्पिटिशन को अभिषेक महज भले ही हार गया हो ; पर एक नयी ज़िन्दगी जीत कर दी थी उसने मुस्ताक चाचा को “

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                   ॐ हर हर महादेव !

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बेइंतहां…

मैं तेरे ख्वाबो में रहू ;

तेरी नींदे खुल जाने के भी बाद !

बिखरने लगू ;

तेरी ज़ुल्फ़ों के संग ,

तेरी रातो से कहने लगू ,

सुबह ना हो ,

बस राते हो ,

इस रात के बाद !

मैं तेरे होठो पर रहू ;

तेरे आंसू पोंछ लेने के भी बाद !

उड़ने लगू ;

तेरी नींदों के संग ,

अंधेरो से कहने लगू ,

लबो पे तेरे हँसी हो ,

तेरे मेरे बिछड़ जाने के बाद !

तू दुआओं में रहे मेरी ;

खुद से मेरा यकीन टूट जाने के भी बाद !

चलने लगू ;

तेरी राहो के संग ,

तेरी मंज़िल से कहने लगू ,

छम छम चलती रहो ,

इस हमसफ़र के थक जाने के बाद !

चंद सच्चे ख्वाब बचे है ;

कुछ झूठी हक़ीक़तों के खुल जाने के भी बाद !


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Kuldeep choudhary

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Bus Stand 【 khaamoshi 】

कभी देखा है बस स्टैंड ; नहीं ; नहीं देखा होगा मेरी नज़र से ; मैं दिखाऊंगा ; तुम पढ़ना ; की बस स्टैंड क्या होता है  और कौन कौन होता है जो वो शहर छोड़ता है और कौन उस शहर में नया है !


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This Diwali In Compitition With The Millionaire

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Kuldeep choudhary

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आफत 🌘

ऐ खुदा ; आज फिर से लिख दु तो आफत है ;

आंसू समेटने आते उसको नहीं ;

और लब्ज रुकेंगे मेरे भी नहीं !


आज अगर ना निकला चाँद तो आफत है ;

नींद मुझे आती नहीं ;

और खवाबो के अलावा वो मिलती कही और नहीं !


माना स्याही बची है कम इश्क़ की ;

हाथ वो मुझे अपना देती नहीं ;

और नसीब मैं पत्थरो पर लिखता नहीं !


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Kuldeep choudhary

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The Last Words 🗳

तेरी यादो से निकला वो आखिरी लब्ज लिख रहा हूं ;

बैठा यहाँ , ना जाने कहा वो अधूरा चाँद देख रहा हूं ।


          कभी पूरा न होगा ,

          किस्सा जो खुदा ने लिखा होगा ;

          बस इसी कहानी का आखिरी ,

          किरदार ढूंढ रहा हूं ।


           जो कभी हक़ीक़त ना होगा ,

           वो आखिरी ख्वाब जो इन आँखों ने देखा होगा ;

           उसी ख्वाब के ताने बाने ,

            खोल रहा हूं ।


तेरी यादो से निकला वो आखिरी पल सहेज रहा हूं ;

बैठा यहाँ ना जाने कहा रात दर रात चाँद को खोते देख रहा हूं ।


            कभी रुके ना आंसू जो ,

            वो दर्द भी आज रो रहा होगा ;

            बस उसी दर्द को चुप समेट कर ,

            अपनी अधूरी ख्वाहिशो की झोली में

             डाल रहा हूं ।



           उम्मीद थी जो सफर मेरा होगा ,

          जिस पल उस मंज़िल का मालिक ;

          मुझे लिखा होगा ,

         खुद के उसी पल को ;

         इसी स्याही से मिटा रहा हूं ।



मत कहो मुसाफिर मुझे ,इस सफर को मैं अलविदा कह रहा हूं ।

        

         हो चुकी बारिशें,

          चल चुकी आंधिया ;

          बैठा यहाँ ना जाने कहा ,

          दिया मेरे इश्क़ का देखो,

          उसी के लिए बुझा रहा हूं ।


हां ; मैं अब नहीं इस सफर में ; मंज़िल को अलविदा कह रहा हूं ।

                               


                              By

                      The insider 

         In the series {the last words}

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A GIRL AND A NIGHT AT HAUZ KHAS 🌃 (हिंदी) #1

Present day { January 13,2015 }

कब्रिस्तान ; ज़िन्दगी भर की मेहनत के बाद लोग यहाँ आकर फिजूल हो जाते है या शायद ज़िन्दगी भर की फिज़ूलियत के बाद यहाँ आकर आज़ाद हो जाते है और तो कुछ पूरी ज़िन्दगी भी नहीं , पहले ही |

मैं कब्रिस्तान के दरवाजे पर ही थी , बड़ा सा चौड़ा , किसी पुरानी धातू  का बना लंबा सा दरवाजा था वो ‘ ठंडी हवाएं कब्रिस्तान की चीखती ख़ामोशी को और बढ़ा रही थी |

दिन के 9 बजे भी दरवाजे के एक तरफ बैठे वो बाबा अभी भी हाथ सेक रहे थे | मेने पूछा…

जादूगर आसिफ की कब्र यहाँ से दिखाई देती है क्या बाबा ??? “

क्योकि मुझे पता था कब्रिस्तान में लड़कियों का जाना प्रतिबंधित होता है  !

एक हाथ से दीवार और , दूसरे हाथ से अपनी लकड़ी का सहारा लेकर एक पाँव से लंगड़ाते हुए मेरे पास आये और मेरे चेहरे को गौर से देख कर हाथ से अंदर की तरफ तेज हवा से लहराते एक पेड़ की तरफ इशारा कर कहा...

” वहां है  वो उसी पेड़ के नीचे , पहले सूखा दरख्त था बस वो , आसिफ जैसे ही पंहुचा उस पेड़ की जड़ों में , फिर से हरा भरा हो उठा चह’चहाने  लगा चिड़ियाओं से ,

और दो तीन लडकिया आ चुकी है तुम्हारी तरह “

बाबा रुक रुक कर बोलते रहे और और कल की पूरी रात मेरे जहन से निकल कर मेरी आँखों के सामने से गुज़र गयी


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{ A few hours earlier }
January 12,2015 ;

10:40 pm ;

Ravelin lounge,Hauz khas

  

     ( background filled with loud music )


” तनीषा को देखा क्या ?” मयंक ने तेज आवाज में अभय से पूछा ।

” क्या ? ” अभय ने उसी तेज आवाज से वापस जवाब दिया ।

मयंक भीड में सबको पीछे ढकेलते हुए जैसे तैसे अभय के पास पंहुचा और कान में जोर से कहा…

” तनीषा कहा है ??? “

अभय ने बिना देर किये पीछे खड़ी नियति से पूछा..

” तनीषा कहा है ‘ तुम्हारे साथ थी ना ?? “

नियति ने अपने कान के पास अपना हाथ लाकर यू घुमाया जैसे कह रही हो उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा ।

             

                ( trans-music louding )

मयंक ने अभय के कंधे पर हाथ रख कर नियति के पास जाकर पूछा

” तूने तनीषा को कही देखा क्या ? “

नियति ने बोला…

” वाशरूम में है वो “

नियति के इस जवाब ने मयंक को थोड़ा सुकून दिया और सभी फिर से उन तेज झपकती रौशनी और आवाजो में गुम हो गए |


###########

” Wow ! कितनी ठंडी और प्यारी हवा है यार यहाँ बाहर ; क्यों हम सब अंदर पागल हो रहे थे ! थोड़ी देर यहाँ रहकर फिर अंदर चली जाउंगी “

में खुद से ही बड़बड़ा रही थी ” मुझे ज्यादा पसंद भी नहीं है शोर , भीड़ ; ये सब कंफ्यूज करते है मुझे ।


में फुटपाथ पर ही थी , सामने से एक आंटी अपने प्यारे से पग (pug) के साथ टहलते हुए मेरी तरफ आ रही थी ,

कितना प्यारा है ये ; जैसे जैसे वो मेरे पास आ रहा था में उसे उतने प्यार से घूरे जा रही थी ; जैसे ही वो मेरे पास आया , में नीचे झुकी उसे दुलारने के लिए पर आंटी जल्दी से मुझसे आगे गुजर गयी , रुकी ही नहीं जैसे अनदेखा कर दिया हो मुझे ।

” Huhh खडूस कही की “

और फिर मेरा ध्यान उस बच्चे पर गया जो गुब्बारे बेच रहा था , में उसी की तरफ चलने लगी की यकायक मुझे लगा जैसे कोई मेरे पीछे चल रहा है ।


अजीब सा लग रहा था ; मेने  जरा सा मुड कर देखा ; हां तीन आदमी थे और एकदम मेरे पीछे और मुझे अजीब तरह से घूर रहे थे ; कुछ ऐसा वैसा नहीं पहना था मैंने , फ्रॉक थी जरा सी घुटनो के ऊपर बस 

और तभी 

उनमे से जो एक सबसे छोटा था करीब 21 या 22 साल का होगा मुझसे आगे निकलते हुए , मेरे हाथ को अपने हाथ से छू कर गया 

और 

सड़क किनारे खड़ी बंद जीप में बैठ कर उसे चालु करने लगा और पीछे आ रहे उन दो आदमियो की तरफ मुस्कुराने लगा ,

पिछले साल हुआ एक ऐसा ही किस्सा मेरे जहन में आया जिसमे तीन आदमी एक लड़की को गाडी में बैठा कर ….

मैं कांप उठी ; 

फोन ; फोन कहा है मेरा ?oh god नही ; मयंक के पास ही रह गया ।

और

मेरा हैंडबैग , उसमे pepper spray भी था ,

मेने अपने कांपते हाथ अपने चेहरे पर फेरे ,

और

तभी एक बड़ा सा हाथ मेरे बाए कंधे पर पड़ा मेरी चीख निकलने से पहले उसने मेरे मुंह को उसी हाथ से जोर से दबा दिया ।

मैंने अपना चेहरा घुमाया और देखा नहीं ये उनमे से नहीं था ,

बैंगनी रंग का चम’चमाता लंबा कोट ; सिर पर एक लंबी , पुरानी , ऊँची हैट ; कोट की एक जेब में सतरंगी रूमाल और दूसरी जेब में कुछ कागज , गले में एक महंगा स्कार्फ़ , और दूसरे हाथ की उंगलियों में जलता सिगार |


Shhhhhhhhhhhhh ! मैं वो नहीं जो तुम सोच रही हो ; मैं वो हूँ जिसे तुम हमेशा याद रखोगी



…………….

will continuous in next part

Thanks for reading 💐

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Kuldeep choudhary 😉