The Missing Bunker  { A short story }

​दिसम्बर 22 , 1943 


जापान में परमाणु हमले से करीब दो साल पहले , जर्मनी के दक्षिण शहर म्युनिक में ।


कुछ अमेरिकी टुकड़ीया म्युनिक शहर को अपने कब्जे में ले चुकी थी।


पर वो दिन , अमेरिका की एक टुकड़ी , जो अपने दो गुमशुदा सैनिको की खोज में हमेशा की तरह निकली थी , के लिए सबसे मशक्कत , और बेबसी भरा दिन था ।


दिन में करीब , 1 बजे , पेट्रोलिंग के दौरान , उन्हें अपने मोटे आर्मी बूट्स की टप टप के अलावा एक अलग आवाज सुनाई दी , ठीक अपने पैरो के आस पास , जो काफी तेज नहीं थी , ऐसा लग रहा था जैसे , हल्की और दबी आवाज में कोई गाने सुन रहा हो ।


म्युनिक शहर के , उस चीखते सन्नाटे में , ये हल्का सा शोर , उस पूरी पेट्रोलिंग टीम का ध्यान अपनी तरफ खेंचने के लिए काफी था ।


और पेट्रोलिंग कमांडर डेनियल रुट को ये समझने में जरा सी भी देर नहीं लगी , की उनके पैरों के ठीक नीचे बने एक बंकर में , कुछ जर्मन सैनिक , स्कॉटलैंड व्हिस्की , के साथ  ,ओपेरा सुनकर दावत उड़ा रहे है ।


शायद उन जर्मन सैनिको को पता ही ना हो की उनका ये म्युनिक शहर अमेरिकीयो के कब्जे में है , वरना अपने दुश्मन को इस तरह से संगीत की आवाज से कौन न्योता देगा , डेनियल रुट शायद उस जमीन की तरफ देख कर यही सोच रहे थे ।


ज़मी पर जमी कुछ मिलीमीटर बर्फ को जब , कमांडर के कहने पर सैनिको ने हटाया ,तो आँखे निकल कर बाहर आ गयी ।

एल्युमीनियम से बना एक मोटा दरवाजा , जो सरक सकता था , अंदर और बाहर जाने के लिए , कुछ सफ़ेद कागजो से ढका हुआ था ।


उस एल्युमीनियम के दरवाजों को सरकाते वक़्त तो ख़ुशी बहुत हुई होगी कमांडर को , आखिर जर्मन सैनिको को पकड़ने के इतने करीब जो थे ।


पर जब वो एल्युमीनियम से बना दरवाजा सरक कर एक तरफ आया , अंदर करीब बीस सीढ़ियों के बाद एक बेहद मजबूत लोहे और कुछ धातुओं से बना अजीब सा मोटा एक और दरवाजा था , जो शायद बंकर के अंदर की तरफ से ही खुलता था ।


कमांडर को ज़रा भी फर्क नहीं पड़ा , उसने मुस्कुरा कर अपनी टुकड़ी से तीन सैनिको को अपने पास बुलाया और इशारो में कुछ कहा , तभी उन तीन सैनिको के अलावा सभी दस कदम पीछे जाकर खड़े हो गए ।


उन तीन सैनिको ने एक एक करके तीन विस्फोटक प्लेट्स , जो जमीनी सुरंगों में इस्तेमाल होने वाला खतरनाक विस्फोटक है , बीस सीढिया उत्तर कर , उस मोटे से दरवाजे के पास लगाकर बाहर निकल आये , जिनमे से एक सैनिक के पास तीन पतली और लंबी रस्सियां थी ।


और वे तीन सैनिक भी दस कदम पीछे चल अपने साथियो के साथ खड़े हो गए और वे रस्सियां जो उस सुरंग से निकल कर आ रही थी , कमांडर को पकड़ा दी ।


कुछ सेकण्ड्स बाद कमांडर ने कुछ बड़बड़ा कर वे तीनों रस्सियां एक साथ खेंच दी , और जो विस्फोट हुआ , वो इतना खतरनाक था , की टुकड़ी के पैरों के नीचे की ज़मीन थर्रा गयी , और पास ही खड़ी एक बहुमंज़िला ईमारत के कांच किसी पतझड़ की तरह ज़मीन पर आ गिरे ।

सीढियो की ओर से उठते उस धुंए की तरफ सैनिक अपनी राइफल और कमांडर अपनी पिस्टल लिए इस तरह खड़े थे जैसे वे जर्मन सैनिक बाहर आने को है ।


कुछ देर बाद जब धुंआ छंटा , तो सभी धीरे धीरे उस बंकर की तरफ़ बढे , और जब अंदर देखा , रति भर भी वो दरवाजा , इधर से उधर नहीं हुआ ।


ये देख कमांडर चिल्लाया , और तभी अंदर से आती उस ओपेरा की आवाज और तेज़ हो गयी ।


अब ये तो तय था , बंकर के अंदर बैठे उन जर्मन सैनिको को ये तो पता था , की अमेरिकी सैनिक उन्हें घेर के खड़े है , और शायद वे ये भी जानते थे , की उनका म्युनिक शहर अमेरिकीयो के कब्जे में है , शायद तभी वे उस ओपेरा को तेज बजा कर उन अमेरिकी सैनिको के शक्ति प्रदर्शन का मजाक उड़ा रहे थे ।


कमांडर डेनियल रुट का सारा फितूर उत्तर गया , उनके बेड़े का सबसे खतरनाक विस्फोटक वो आजमा चुके थे वो भी एक नहीं , तीन एक साथ ।


झल्ला कर कमांडर उन सीढियो में सबसे आखिरी सीढी तक गया और उस मोटे से दरवाजे के आगे जाकर चिल्लाया , तीन दिन बाद क्रिसमस पर वो फिर विस्फोट करेगा , उस दिन  तुम्हे जीसस भी नहीं बचा पाएंगे ।


तीन दिन बाद जब वैसा ही विस्फोट वापस किया गया , दरवाजा वही फौलाद की तरह खड़ा रहा , आखिर हार कर , उसने सुरंग खोदने वाली भारी भरकम अमेरिकी ड्रिलिंग मशीन मंगवा ली जो उत्तरी जर्मनी में थी , जिसे सड़क द्वारा म्युनिक तक पहुचने में बीस दिन लगने थे ।


बीसवें दिन तक , जब तक वो ड्रिलिंग मशीन नहीं आ गयी , वे जर्मन सैनिक वही ओपेरा सुनते और अमेरिकीयो को चिढ़ाते ।

उस दिन जब ड्रिलिंग मशीन ने उस बंकर में एक बड़ा छेद किया , कमांडर ने आर्डर दिया बंकर में छेद से कुछ हथगोले फेंके जाए ताकि उन जर्मन सैनिको की ज़िंदा बचने और वापसी गोलाबारी की उम्मीद ख़त्म हो जाये ।


और जब कमांडर और कुछ सैनिक अंदर घुसे तो देखा , एक ट्रांजिस्टर , एक बैटरी से प्लग इन है , और उन हथगोलों के विस्फोट के बाद भी बज रहा है , कमांडर की नज़र दूसरे कोने में पड़ी तो , उसके होश उड़ गए , दो अमेरिकी सैनिक एक ही रस्सी से बंधे थे , मृत और नग्न ।


और उनके किनारे से निकलती एक सुरंग , जो उन जर्मन सैनिको ने अपने निकलने के लिए खोदी थी , में कमांडर ने अपने एक सैनिक को घुसाया , देखने के लिए की आखिर ये सुरंग निकलती कहा है , तो जब वो अमेरिकी सैनिक सुरंग के दूसरे छोर पर निकला तो ये वही जगह थी जहाँ , विस्फोठ के वक्त दस कदम दूर अमेरिकी सैनिक खड़े होते थे ।


क्रिसमस के दिन जब उस कमांडर ने विस्फ़ोट किया तब उसने शायद अपने सैनिक ठीक से , नहीं , गिने ही नहीं , वे 49 नहीं , 51 थे ।


हां ! उन दो जर्मन सैनिको के साथ , जिन्होंने उन दो गुमशुदा अमेरिकी सैनिको की यूनिफार्म पहन रखी थी ।


बंकर में जर्मन झंडे के साथ एक कागज पर डच भाषा में लिखा था….


” ik had constipatie van sommige laatste days..thanks commandant, uw Blast geeft mij dus reliëf … tot slot ik heb een aantal kak … bedankt voor niet het tellen van “


English translation-


” I had constipation from some last days..thanks commander , your blast gives me so relief…finally I did some poop…thanks for not counting “



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Written by

Kuldeep choudhary

The insider ©

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The MILLIONAIRE {हिंदी} #2

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September 27, 11:10 pm

Monitoring And Decoding Room

R&AW Headquarter ; Delhi , India.

कंप्यूटर और फोन ट्रैकिंग , टैपिंग की अत्याधुनिक मशीनों से भरा व्यवस्थित कमरा और सबसे कोने में रखे एक कंप्यूटर के सामने बैठ कर कुछ काम कर रहा जॉय अचानक कमरे से भाग कर , बाहर निकल , पास ही बने joint secretary के ऑफिस में घुस गया ।


जॉय- सर सॉरी ! पर आपको ये देखना चाहिए । its urgent .

सुधीर शुरी ( Joint secretary)- क्या वाकई ???

सुधीर शुरी उतावलेपन से उठके जॉय के पीछे हो लिए , और जॉय वापस अपने उसी कंप्यूटर के सामने बैठकर बोला..”सर आपने लाहौर के एक सॅटॅलाइट फोन को surveillance पर रखने को कहा था ; कुछ एक महीने पहले ।

सुधीर शुरी- हाँ ! कोई मूवमेंट है क्या ?

जॉय- सर ! सॅटॅलाइट फोन का कोई नंबर तो होता नहीं है ,तो कॉलर पता लगाना मुश्किल होता है , पर कॉलर की लोकेशन ट्रेस करना उतना ही आसान होता है । कुछ देर पहले ही इस सॅटॅलाइट फोन पर पहली बार कॉल आया करीब 9:15 बजे । सर लोकेशन मुघलपुरा , लाहौर है ।

सुधीर शुरी- कॉल किसने किया ! बात क्या हुई ? कुछ बता सकते हो !

जॉय- सर जैसा की मेने कहा कॉलर के बारे में नहीं , पर उसकी लोकेशन आसानी से ट्रेस की जा सकती है । और वही देखकर मैं आपके पास भाग कर आया ।

सर dialer call ; PSLV 15 से जुड़ा हुआ था ।


सुधीर शुरी- क्या कह रहे हो ? PSLV-15 ? ISRO का सॅटॅलाइट ? कॉल इंडिया से किया गया उस लाहौर के सॅटॅलाइट फोन पर ???

जॉय- हां सर ! कॉल इंडिया में कही से सॅटॅलाइट to सॅटॅलाइट किया गया है , मतलब इसरो के सॅटॅलाइट से पाकिस्तान के किसी टेलीकॉम सॅटॅलाइट पर । और सर रियल टाइम लोकेशन तो पता या तो इसरो को हैक करके , या इसरो से official passcodes मांग के लगायी जा सकती है ।

और सर मैं हैक कर सकता हूं ।

सुधीर शुरी- नहीं ! मैं passcodes लेने की formalities पूरी करता हूं , कोशिश करेंगे की कल तक लोकेशन हमारे पास हो । पर ये बात तुम अपने तक ही रखोगे , कलिख को भी नहीं । you understand that ???

जॉय- ओके सर ! सर बात सिर्फ दो मिनट हुई उस फोन पर , अगली बार हम बात भी सुन पाएंगे ।

सुधीर शुरी well done कहते हुए उस कमरे से बहार निकल गए ।


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September 28 , 10:00 am

Quaid-e-azam college of commerce for girls , Lahore , pakistan

कॉलेज के बड़े से दरवाजे के सामने सड़क पर खड़ा एक गाड़ियों का काफिला , जिनमे सबसे आगे और पीछे पाकिस्तानी रेंजर्स की दो काली जिप्सी थी , उद्योगपतियों को IS से मिल रही धमकियों के बाद पाकिस्तानी आर्मी को इन उद्योगपतियों की सुरक्षा में लगाया गया था और बीच में , 3 आलिशान Volvo xc 90 खड़ी थी ।

दूर से देख कर ही वो कॉलेज के दरवाजे के परे बैठा गार्ड सलाम किये हुए खड़ा था ।

उन तीनों में से सबसे आगे की volvo xc 90 में बैठा मिलियनेयर गाडी के काले शीशो से साफ़ नज़र आ रहे कॉलेज के दरवाजे को घूरे जा रहा था और तभी उस दरवाजे से

एक 23 साल की लड़की , आँखों में हल्का काजल ,कानो में लंबे चांदी के झुमके , गुलाबी होठो पर मुस्कुराती मुस्कान , हरे और सफ़ेद रंग के सलवार कमीज , हाथो में एक बड़ा सा कंगन , ऊँगली में एक बड़ी सी अंगूठी , और मखमल से पैरो में चमड़े की बनी जुतिया , जैसे बसंत के मौसम ने इंसानी रूप ले लिया हो ,

बाहर निकली ।

और गार्ड की उंगलियो के इशारे को देख गाड़ियों की ओर दौड़ी चली आयी ।

तीन खड़ी उन आलिशान गाड़ियों में से उसने तीसरी का दरवाजा खोला , काले शीशो की वजह से वो हर बार समझ नहीं पाती थी , अंदर से आवाज आई..”साहब आगे से दूसरी नंबर की गाडी में है “


और वो भाग कर , volvo का दरवाजा खोल अंदर बेठ गयी , और आव देखा ना ताव बोलना शुरू कर दिया..

“मुझे बात ही नहीं करनी तुमसे , कल नहीं आये , परसो भी नहीं मिले , तुम्हारे काम काम होते है , तो हम भी फ़िज़ूल नहीं है यहाँ”…बोलकर एक झलक उसने मिलियनेयर की आँखों में देखा , armaani के किसी एक महंगे चश्मे ने उसकी आँखों को छुपा रखा था ।

“हटाओ इसे”…कहकर उसने वो काला चश्मा मिलियनेयर की आँखों से हटा दिया ।

“अब देखो मेरी तरफ और बताओ क्यों नहीं आये मुझसे मिलने”

वो हल्का सा मुस्कुरा कर सुनता रहा , और गाड़ियों के काफिले से वो volvo अलग होकर एक किसी दूसरे रास्ते पर चलने लगी और कुछ दूर जाकर ठहर गयी ।

गाडी रुकते ही वो झट से गेट खोल कर बाहर कार के दूसरी तरफ जा खड़ी हुई , जहा से मिलियनेयर उतर रहा था ।

मिलियनेयर जोर से हँसता हुआ बोला ” कितना बोलती हो ना , वाक़ई वक़्त की कमी थी , इसीलिए मिल नहीं पाए , वरना तुम जानती हो , जी कहा लगता है मेरा तुम्हारे बिना”।


किसी पठार पर खड़े थे दोनों , तेज हवा , सरसो के फूलों की गंध से पता पड रहा था कि आस पास कही खेत है , पानी का हल्का शोर बता रहा था कही झरने भी थे आसपास ।


“जानती हूं , पर ये हर बार मुझे इतना दूर इसी जगह क्यो लाते हो मिलने और ये बन्दूक मत रखा करो , रेंजर्स है ना साथ , तुम्हे नहीं रखनी है ये”…तेज हवा से उड़ते कोट की वजह से देख पायी वो रिवाल्वर को ।

“जिनके ख्वाब महंगे होते है ना नसीबा , उन्हें उजालो से डर लगता है “…मिलियनेयर पास ही लगे पेड़ की लहराती पतियो को देख कर बोला ।


कितनी शायरी मारते हो ना , आज मुझे देख कर कोई जुमला याद नहीं आया ” हँसते हुए नसीबा बोली ।


“एक तुझे देख लेने के बाद किसी का दिल तोड़ने का जी नहीं करता ;

इस ईद पर मिलिएगा , तुम्हे देख कर रोज़ा तोड़ेंगे हम” ….


नसीबा की आँखों में देख कर मिलियनेयर ने बड़े गज़ब तरीके से कहा , और मुड़कर गाडी की तरफ जाने लगा ।

“जानते है वक़्त कम है तुम्हारे पास , पर वाह वाह तो सुन लो हमारी”…कहते हुए नसीबा गाडी तक आयी ।

“ये लो ! संभाल कर ; कुछ देर में बहादुर अली तुम्हे कॉलेज छोड़ देगा”…एक सफ़ेद रंग का लिफाफा नसीबा को पकड़ा कर मिलियनेयर volvo में बैठ गया ।

“ऐ सुनो , ये हर बार एक लिफाफा देकर जाते हो , और खोलने को मना कर रखा है , वो भी मोहब्बत की कसम देकर , कब खोले हम इसे ये तो बता दो”…नसीबा ने गाडी के शीशे को अंगूठी से बजाकर कहा ।

“एक दिन कसम खुद-ब-खुद टूट जायेगी , उस दिन खोल लीजियेगा इसे और एक बात बताऊ तुम्हे , याद रखना पेरिस में एफिल टावर के नीचे लोग अपने खोये हुए प्यार को ढूंढने के लिए इकट्ठा होते है” ।…कहकर मिलियनेयर ने ड्राइवर को चलने के लिए कह दिया ।



To be continued……….#3

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Read 1st part here

The MILLIONAIRE #1


Written by

Kuldeep choudhary

The Insider©


The MILLIONAIRE {हिंदी} #1


September 27, 09:10 pm

Mughalpura police station ; Lahore

Pakistan


“बता दे जो पूछ रहे है…वरना अंजाम से तो वाकिफ होगा तू”…थानेदार निज़ाम अली ने रसोइये के मुँह को अपने मोटे हाथो से दबा कर गुस्से में पूछा ।

“साहब ! उतना ही जानता हूं मैं भी , जितना आप और ये पूरा मुल्क जानता है उनके बारे में”…भींचे हुए मुँह से रसोइया अटकते हुए बोला ।

“तबियत ठीक करो इसकी , मैं आता हूं कुछ देर में”…निजाम अली ने पास ही खड़े एक दूसरे पुलिस वाले को अपने हाथ का डंडा देकर कहा और फोन कान के लगा कर धीमे से फुसफुसाया …

“काम हुआ या नहीं ???”


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 September 27 , 09:10 pm ( same time )

Mughalpura road , Lahore , pakistan

उसी समय , मुगलपुरा की नामचीन बस्ती में , जहा कई करोड़पति लोग रहते थे , के एक बड़े से आलिशान घर में !

(अँधेरा फैला हुआ )

बीच में बने एक बड़े से हॉल में एक के ऊपर एक पड़ी तीन लाशे , और दिवार के सहारे बैठी एक जवान औरत और एक बच्चा , उनके खौफ खाये हुये चेहरे बता रहे थे की उन तीन लोगो को लाश बनते उन्होंने अपनी आँखों से देखा था !

और

सामने सीढियो पर बैठा हुआ एक शख्स जिसका चेहरा साफ नज़र नहीं आ रहा था , खुला हुआ कोट , पेंट से आधा अधूरा बाहर निकला हुआ सफ़ेद , खून से रंगा हुआ कमीज , दाएं हाथ की आस्तीन से निकलकर , rolex की काले रंग की घडी से , हाथ में पकड़ी हुई इज़रायली रिवाल्वर के आगे लगे , लंबे आटोमेटिक silencer से टपकता खून देखकर अंदाजा लगाया जा सकता था की वो सीढियो पर बैठा अकेला शख्स उन तीनों पर भारी पड़ा ।

तभी अंदर बैडरूम से फोन बजने की आवाज आई , वो सीढियो से उठकर बैडरूम की तरफ चलने लगा , और चलते चलते अपने दाए हाथ से बाए हाथ में काले दस्ताने पहन कर उसने वो केसरिया रंग की स्क्रीन में बज रहा satellite फोन उठाया ।

बड़ी तेज और बुलंद , पर किसी अधेड़ उम्र के शख्स की आवाज फोन के उस तरफ से आयी…

“hello millionaire”!

 जवाब में उसने कुछ नहीं कहा ,उसके आँखों की पुतलियां , फोन पर उस अधेड़ उम्र की आदमी की बातों के साथ साथ घूम रही थी ।

चुपचाप उस फोन पर सुनते हुए एकदम उसका ध्यान , बाहर हॉल में बज रहे फोन से टुटा ।

बिजली की तेजी से उसने वो satellite फोन बिस्तर पर फेंककर , अपनी रिवॉल्वर को कसकर पकड़कर वो बिना डरे हॉल की तरफ बढ़ा ।

फोन बजने की आवाज उस लाशो के ढेर से आ रही थी ।

उन लाशो को पैरो से धकेल कर उसने ज़मीन पर पड़े उस मोबाइल को उठा कर उस औरत की तरफ कर दिया, जो शायद उन तीनों में से किसी की जेब से गिरा होगा ।


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“काम हुआ या नहीं ???”…निज़ाम की मोटी फुसफुसाती आवाज फोन उठाते ही उसे दूसरी तरफ से आयी ।

“Hello ! बोलो हरामखोरो ??? काम हुआ के नहीं ???”…झल्लाते हुए उसने फिर पूछा ।

“हेल्लो ,,,, हेल्लो ….निज़ाम अली फिर चिल्ला कर बोला ।


“हेल्लो ! सुनिये हम बोल रहे है आपकी बेगम , आप , आप छोड़ दीजिए उसे , आपने , आपने किसे पकड़ा है इनके रसोइये को , वरना ये मार देगा मुझे और आपके बच्चे को , वहशी है पूरा ये”…बात पूरी होने से पहले उस आदमी ने फोन अपने कान के पास लाकर कहा..”वही छोड़ के जा मेरे शेफ़ को , जहा से उठाया था , अगर बीवी के हाथ की बनी बिरयानी खाकर सोना चाहता है तो”…कहकर उसने वो फोन लाशो के ऊपर फेंक दिया !


थानेदार निजाम अली बौखलाया हुआ उस रसोइये के पास पंहुचा और खुद ही रसोइये की रस्सी खोलने लगा जो रसोइये के हाथों और पैरो से एक साथ बंधी थी ।

“अरे वही छोड़ आयो जहा से उठाया था इसे “…रुमाल से सिर का पसीना पोंछते हुए पास खड़े दो पुलिस वालों से निज़ाम अली बोला ।


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Will continues in next part…..

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Kuldeep choudhary

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