ख़ातिर उसके !

​मैं चिखू और उसे सुनाई ना दूं ;

मैं खुद को रोकु और उसे कभी बहने ना दूं !


मैं खुशबू बन जाऊं , उसे कभी घुटने ना दूं ;

में पानी बन जाऊं , उसे सुलगने ना दूं !


मैं धुँआ बन जाऊं , मुझसे ज्यादा उसे कभी कुछ देखने ना दूं ;

में बारिश बन जाऊं , बालू रेत पर उसके पैरों को जलने ना दूं !


मैं दुआं बन जाऊं , दर पे किसी , सर उसका झुकने ना दूं ;

मैं मरहम बन जाऊं , कोई घाव उसका नासूर होने ना दूं !


मैं समंदर बन जाऊं , नदियों सा उसे , अकेले चलने ना दूं ;

मैं काजल बन जाऊं , उसकी आँखों को खाली ना रहने दूं !


मैं रात बन जाऊं ; दिन के आसमां सा उसे कभी खाली ना रहने दूं ;

मैं कहानी बन जाऊं , किस्सा ये मोहब्बत का कभी खत्म ही ना होने दूं !


मैं बहाना बन जाऊं उसका , उसे कहीं कभी वक़्त पर ना पहुँचने दूं ;

मैं गुनाहगार बन जाऊं ; उसके सर कभी कोई इल्ज़ाम ना आने दूं !






Kuldeep Choudhary ©

La`Parvaah ©

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3 thoughts on “ख़ातिर उसके !

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  1. मैं समंदर बन जाऊं , नदियों सा उसे , अकेले चलने ना दूं ;

    मैं काजल बन जाऊं , उसकी आँखों को खाली ना रहने दूं !

    वाह बहुत ही खूबसूरत कविता☺

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