ऐ ग़ालिब !

कुछ इस हद तक पी हमने , कल शाम ;

ऐ ग़ालिब ;

साकी सुनाता रहा अपनी मोहब्बत की कहानी ; और हम रोते रहे अपना किस्सा समझ कर !


( मुलाहिजा फरमाइयेगा


कि सबकी वही कहानी है ;

एक बेवफा है , एक मासूम सी मोहब्बत और एक जवानी है !


( फिर महफिल में एक दबी आवाज सुर पकड़ती गयी...

ये किस्सा मोहब्बत का थोड़ा और लंबा हो जाये ; जो मैं दास्ताने अपनी कह दू ;

ऐ ग़ालिब , खैर छोर अब ;

मैं फिक्र अपनी नहीं , महफ़िल में मुस्कुराते चेहरों की करता हूं  !

 

( होशियारी से सुनियेगा


मिले वो कई दिनों बाद तो बोले ” काफी अच्छा लिखते हो “

ऐ ग़ालिब ;

अब कैसे कहू  “दिल के टुकड़ों और कुछ यादो के बदले किराये पर मिलता है ये हूनर !


( और दिल की उम्मीदों को लब्ज इस तरह दिए...

वो तड़पती रही कुछ देर तक , मरने से पहले ;
ऐ ग़ालिब;

उस दिये  में किसी ने जान बूझकर तेल नहीं डाला !


( और मतलब समझते देर हो चुकी थी…


वो क्या जाने उन रातो में मोहब्बत कितनी थी ;

उसे तो बस मतलब मेरे बिस्तर की सलवटों से था !


____________________________


Written by

Kuldeep choudhary

The Insider©

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5 thoughts on “ऐ ग़ालिब !

  1. Loved the line “दिल के टुकड़ों और कुछ यादो के बदले किराये पर मिलता है ये हूनर !”, dil ke tukdon ka to pta nahi par han yadon ko to girbi rakhna padta hai

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